पिछले दिनो हुए तमाम दल बदल ने साबित कर दिया कि नैतिकता और शर्म राजनीति की डिक्शनरी मे नही रहे .नेताओं का स्वार्थ सर्वोपरि है. तमाम अपराधी किस्म के नेता पार्टियों की पहली पसंद बन गये हैं. अपराध और राजनीति का ताना बना जनता को भी खूब सुहाता रहा है . अन्ना के आंदोलन के बाद शायद कुछ जागरूकता जनता मे आई हो... यह चुनाव के बाद ही तय हो पाएगा. लेकिन राजनीतिक पार्टियाँ दागदार छवि वालो को अपना कर साबित कर रही है कि उनकी सोच मे कोई फ़र्क नही आया .तभी तो जेल मे बंद बाहुबलियों को भी टिकट बाँटे जा रहे हैं वो लोग जिन्हे समाज हत्यारा ,दुराचारी के नाम से पहचानती है वे भी चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसा नही की यह नया ट्रेंड है...पहले भी दबंग किस्म के लोगों का राजनीति मे रहे हैं . पर अब बात कुछ ज़्यादा ही बढ़ गयी है . अपराधी बन के राजनीति मे जाना आसान हो गया है अब . लोग भी शायद ऐसे उम्मीदवारों को पसंद करते हैं..तभी तो ऐसे लोग जीत जाते हैं. चुनाव आयोग को चाहिए कि ऐसे लोगों के नामांकन को रद्द कर दे ..जनता का भी फर्ज़ है कि वो ऐसे लोगों को वोट ना करे .अगर ऐसे लोग चुन कर आते हैं तो यह हमारे लिए भी शर्म की बात है. जागो जनता जागो...अभी नही तो कभी नही ....
शनिवार, 7 जनवरी 2012
गुरुवार, 29 दिसंबर 2011
संसद की गरिमा और सर्वोच्चता की बात करने वाले माननीयों को 2G के आरोपी( कनिमोझी ) को राज्य-सभा में अपने बगल में बैठाने में शर्म नही आती .....उन्हें तब भी शर्म नही आती जब उनका एक साथी ( धनञ्जय सिंह ) हत्या के आरोप में जेल भेज दिया जाये और एक पहले से ही ( सुरेश कलमाड़ी ) भ्रस्टाचार के आरोप में जेल में हो .....लेकिन जब जनता अपने हक के लिए आन्दोलन करती है और संसद पर दबाव बनाती है ....तो संसद की गरिमा इन्हें खतरे में दिखाई देती है .....
संसद ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र मे लोक को अनदेखा नही किया जा सकता ..यह अन्ना के आंदोलन का दबाव ही है कि सत्र 3 दिन बढ़ा दिया गया ...लोक सभा और राज्य सभा 12 बजे रात तक चल रही है . यह अन्ना के विरोधियों को जवाब है संसद द्वारा ....
गुरुवार, 15 दिसंबर 2011
रविवार, 16 अक्टूबर 2011
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011
ग़रीब
दुनिया के मजदूरों एक हो कहने वाले
मार्क्स
अब तनी हुई मुट्ठियाँ ढूंढते रह जायेंगे
ये सरकार है भईया...
ये गरीबों को भी
अब अमीर कहलावायेंगे...
सरकार ने गरीबी की परिभाषा बदल डाली है
बत्तीस रूपये कमाने वाले की अब हर रोज दिवाली है
गरीबों की तकदीर एक दिन इतनी बदल जाएगी
सरकार इनका खाता स्विस बैंक में खुलवाएगी
शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011
आम आदमी
दिख जाता है हर गली हर नुक्कड़ पर
चेहरे की बेबसी छुपाये ....
आम आदमी
कितना निरीह
जीवन के थपेड़े सहता हुआ
खुद को घसीटता
आम आदमी ...
ता-उम्र टूटता
जुड़ता हुआ .....
अदम्य जिजीविषा लिए
आम आदमी .
ता-उम्र टूटता
जुड़ता हुआ .....
अदम्य जिजीविषा लिए
आम आदमी .
गुरुवार, 29 सितंबर 2011
sapne
दरक रहा है भीतर कुछ
बार-बार ....लगातार
बार -बार वह खुद को तोड़ती
जोड़ने में लगी है, सपने
दूसरों के ...
अपनी बारी के इंतजार में
कभी तो पूरे होंगे , सपने
जो देखे थे बचपन से ....
जीवन के गणित में उलझी ...
बुनते हुए सपने .....
अनजान है इस बात से कि
उसकी परिणति
दूसरों के सपने पूरे होते
देख कर खुश होने में है .
शुक्रवार, 23 सितंबर 2011
शुक्रवार, 27 मई 2011
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