रविवार, 10 जून 2012

उसकी बेवफाई का किससे  करें गिला
उसके सिवा जहान  में कोई राजदार  भी नहीं


इबादत , वफ़ा , नशा या रंजिश कोई
वो  इश्क  को जाने   क्या -क्या समझता है
हर बार वो गढ़ लिया करता है
अपने लिए

नयी नायिका

और मैं हर बार
उसे चाँद की तरह
निहारा करती हूँ

शनिवार, 9 जून 2012

जल

बीते दिनों परा लगातार बढ़ता रहा और  जल की उपलब्धता  कम होती गयी .न्यूज चैनल में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भवन तक में पानी पहुचाते हुए दिखाया गया . देश में  साफ पानी की समस्या दिनों दिन गहराती जा रही है.  कई स्थानों में लोग दूर-दराज से पानी लाकर जीवन बसर कर रहे हैं .   जमीन में निरंतर पानी का स्तर घट रहा है साथ ही जो उपलब्ध है वो भी  प्रदूषण  के कारण पीने योग्य नहीं  रह गया है.  देश की राजधानी दिल्ली से लेकर गाँव तक में स्वच्छ  पानी मिलना  मुश्किल है .  कल कारखानों के कारण भूगर्भ जल दूषित हो रहा है . इस कारण  लगभग हर घर  में पानी साफ करने की मशीन ने अपना स्थान बना लिया है .  आर ओ   से पानी साफ करने में जितना पानी हमें पीने योग्य मिलता है लगभग उतना ही पानी  बेकार हो कर नाली में बह जाता है . ऐसे में सवाल यह उठता है कि सरकार इस तरह की मशीनों पर पाबन्दी क्यों नहीं लगाती . एक तरफ पानी को लेकर हाहाकार मचा होता है और दूसरी तरफ हम अपने पीने के पानी स्वच्छ करने में  लाखों लोगों का हक मार रहे होते  हैं . स्वच्छ जल हर मनुष्य का अधिकार  है लेकिन वो दूसरों के अधिकार कि शर्त पर न हो  .सरकार को चाहिए कि वह जल शोधन के नए तरीके  इजाद करे . जिससे पानी कि बर्बादी कम हो  और सभी को सामान रूप से पीने योग्य पानी उपलब्ध हो .
कितना भयावह होता है सच के साथ जीना ...
जिंदगी आसान हो जाती है भ्रम के बचे रहने से ... 
[1]
ऐसा नही कि सच से वाकिफ नही हूँ मैं ..
बाज़ार में मगर सच के खरीदार बहुत हैं...

[2]
 तमाम उम्र जिसे हम ख़ुदा समझते रहे ..
वक़्त आने पर वो मामूली बुत निकला ...

[3]
 सितमगर कोई और होता तो सह लेते मगर
सनम अपना ही काफ़िर निकला...

[4]
 इस समय में -
                  ईमान बचाए रखना
                  दोस्तों से गिरेबान बचाए रखना
                                                         - मुश्किल है .

शनिवार, 2 जून 2012

कठिन समय

ये कविता का कठिन समय है 
और 
कविता 
अपने कठिन समय  में
उतनी ही लिखी और पढ़ी जा रही है 
जितनी पहले हुआ करती थी .

लोगों  ने  इसे कठिन  समय 
साबित करना शुरू कर दिया है .


वे शब्दों की तरफदारी में 
व्यस्त हैं अपने 
कवितापन को वे दीमक की तरह 
चाट जायेंगे ..
हसेंगे  और कहेंगे ..
कि हमने घोषित कर दिया था पहले ही
' मरना तो तय था '

 और फिर  एक अट्टहास होगा 
समूहगान की तरह 

मगर ठीक उसी वक़्त 
कुछ लोग लड़ रहे होंगे 
कविता को बचाने के लिए 
 अस्मिता कि लड़ाई में 
शब्द दर शब्द 
अपनी अर्थवत्ता के लिए 
जूझ रहा होगा 
उस अघोषित लड़ाई से 
जो उसके बचे रहने का 
सबूत होगी इतिहास में ......

शब्दों की अर्थवत्ता बची रहेगी  
कविता अपने कठिन समय के बावजूद 
भी बची रहेगी .
 

मंगलवार, 29 मई 2012

तमाम उम्र जिसे हम खुदा समझते रहे
वक़्त आने पर वो मामूली बुत निकला ..
सितमगर कोई और होता तो सह लेते मगर
सनम अपना ही काफ़िर निकला...

शुक्रवार, 18 मई 2012

साख में सेंध

पिछले दिनों संसद में जो कार्टून विवाद  हुआ , उसने सोचने पर मजबूर कर दिया कि हमारे नेता अपने साख को लेकर कितना डरे हुए हैं . एक कार्टून उनकी जमी जमाई सत्ता हिला देने की क्षमता रखता है . इस कार्टून विवाद से यह भी देखने को मिला कि राजनीतिक पार्टियाँ ' जाति ' की तरह बर्ताव करने लगी हैं . ये जातिगत भावना से भर गये हैं ,राजनीति की जातिगत भावना से....  अन्ना आन्दोलन के बाद से ही ये विशेषता देखने को मिल रही है. जिस तरह से आन्दोलन के बाद के सत्र में सभी राजनीतिक दलों ने अन्ना आन्दोलन पर सवाल उठाये और एक सुर में आन्दोलन की भर्त्सना की उससे जाहिर होता है कि राजनीतिक दल अपनी साख को लेकर संशयग्रस्त हो गए हैं .ये अब कार्टून से भी डरने लगे हैं . ऐसे समय में सारी पार्टियाँ  एक नज़र आती हैं . कार्टून विवाद में पाठ्यक्रम ही बदल दिया जायेगा. अब इन्टरनेट पर भी लगाम लगाने कि तैयारी चल रही है . अगर अपनी साख कि इतनी ही चिंता है तो इन्हें अपना कर्म सुधारना चाहिए ताकि जनता का भरोसा बचा रहे देश कि इस सर्वोच्च संस्था में ...संसद में...असल में हमारे नेता डर गये हैं कि कहीं उनकी सत्ता छिन ना जाये . संसद की जिस सर्वोच्चता की बात वे करते हैं ...वे भूल जाते हैं कि उन्होने अपने साथ राजा ,कनिमोझी जैसों को बिठा रखा है . राजा ,कनिमोझी ,कलमाड़ी के जेल जाने से उनकी साख को बट्टा नहीं लगता ...एक कार्टून छप गया तो सांसदों की साख में सेंध लग गयी

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

औरत

औरत


(1)
मैंने लिखा 'औरत '
तब जान पाया कि मेरे हाथ मे
बाज़ार मे सबसे तेज़ बिकने वाला शब्द है ...

(2) मैंने लिखा 'औरत'
जो सबसे तेज़ बिकती है
तस्वीर मे हो या समय के मजबूर हाथों में....
(3)
मैने लिखा औरत
और देखा
शब्द लोहे मे ढल रहे हैं .

(4)
मैने लिखा औरत
और जाना
वह सृष्टि की सबसे सर्जनात्मक
और संघर्षपूर्ण कृति है .
 (विमलेश त्रिपाठी की कविता -वह नहीं लिख पाया -पढने के बाद )

शनिवार, 7 जनवरी 2012

मेरे युग का मुहावरा है फ़र्क नही पड़ता

पिछले दिनो हुए तमाम दल बदल ने साबित कर दिया कि नैतिकता और शर्म राजनीति की डिक्शनरी मे नही रहे .नेताओं का स्वार्थ सर्वोपरि है. तमाम अपराधी किस्म के नेता पार्टियों की पहली पसंद बन गये हैं. अपराध और राजनीति का ताना बना जनता को भी खूब सुहाता रहा है . अन्ना के आंदोलन के बाद शायद कुछ जागरूकता जनता मे आई हो... यह चुनाव के बाद ही तय हो पाएगा. लेकिन राजनीतिक पार्टियाँ दागदार छवि वालो को अपना कर साबित कर रही है कि उनकी सोच मे कोई फ़र्क नही आया .तभी तो जेल मे बंद बाहुबलियों को भी टिकट बाँटे जा रहे हैं वो लोग जिन्हे समाज हत्यारा ,दुराचारी के नाम से पहचानती है वे भी चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसा नही की यह नया ट्रेंड है...पहले भी दबंग किस्म के लोगों का राजनीति मे रहे हैं . पर अब बात कुछ ज़्यादा ही बढ़ गयी है . अपराधी बन के राजनीति मे जाना आसान हो गया है अब . लोग भी शायद ऐसे उम्मीदवारों को पसंद करते हैं..तभी तो ऐसे लोग जीत जाते हैं. चुनाव आयोग को चाहिए कि ऐसे लोगों के नामांकन को रद्द कर दे ..जनता का भी फर्ज़ है कि वो ऐसे लोगों को वोट ना करे .अगर ऐसे लोग चुन कर आते हैं तो यह हमारे लिए भी शर्म की बात है. जागो जनता जागो...अभी नही तो कभी नही ....