शुक्रवार, 27 मई 2011

उपजाऊ जमीन के बदले विकास नही चाहिए 
 अन्नदाता के बदले करदाता नही चाहिए 
बखार के बदले  माल नही चाहिए (भट्टा पारसौल, सिंगुर,नंदीग्राम  के सन्दर्भ में )

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

शनिवार, 6 नवंबर 2010

???

ओबामा जी का स्वागत है . भारत आये हैं तो कुछ सोच कर ही आये होंगे. वर्ना उनके आगे हमारी बिसात क्या है, तभी तो भारत की सुरक्षा एजेंसियों पर उनको भरोसा नही है. अमेरिका से सब तामझाम ले कर आये हैं. हम शर्मिंदा हैं की हम उनकी सुरक्षा भी नही कर सकते . चलिए कुछ तो सबक सीखना होगा इन साहेब से.अपनी सुरक्षा अपने हाथ.हमारा कुछ काम तो कम कर दिया . खैर, जबसे आने की खबर सुनी थी यही सोच रही थी की आये क्यों हैं?? जवाब हो किसी के पास तो हमे भी बता देना...खैर.मेरी समझ काम हो सकती है पर यही लगता है परमाणु  संधि पर ही  कोई अहम्  बात होगी.कोई अपने (अमेरिका)हित की बात ही होगी..

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

चेहरा

कहते हैं  चेहरा आईना होता है
पर ...
आज-कल के आइनों से संभल  कर रहना
आईने झूठ भी बोला करते हैं.

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

चिठ्ठियाँ

( 1 )
भारत में सबसे ज्यादा डाक घर .....
क्या चिठ्ठियाँ अभी भी लिखी जाती हैं ???



( 2 )
आज भी याद है जब  बचपन में नानी हमें  चिठ्ठी लिखा करती थीं,पढ़ के  आँखों में आंसू भर जाया  करते थे और  हम  गर्मी  की छुट्टियों का इंतजार करते थे कि कब जल्दी से दिन बीते ,पढाई ख़तम हो और हम गाँव पहुँच जाएँ .

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

क्या भारत अभी भी एक कृषि प्रधान  देश है?  देश में किसानो के आत्महत्या की ख़बरें आम हैं.देश में खाद्यान्न  की आपूर्ति  के लिए  आयात  तक की नौबत  है .दाल,चीनी,प्याज आम आदमी की पहुच से बाहर है .
            गरीब इंडिया और भारत के बीच पिस रहा है.एक तरफ भूमंडलीकरण तो दूसरी तरफ सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र )  दोनों के बीच किसानो के  आवाज दबती जा रही है .
                                                                                        क्या केवल आर्थिक रूप से समृध्ह होना और विकसीत  देश बनने की होड़ में शामिल होना कई बड़ी समस्याओं को जन्म नही दे रहा .महंगाई का बढ़ते चले जाना मान्य हो गया है .मध्यम  वर्ग   तो फिर भी किसी तरह गुजारा  कर ले रहा है पर उन गरीबो का क्या जो दो वक़्त की रोटी   भी बड़ी मुश्किल  से जुटा पाते  हैं.

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

शांति के दूत


ओबामा को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार ...
उस देश के  राष्ट्राध्यक्ष  को
जिसने विश्व  में हर तरफ तबाही मचा रखी है.
जिसने हमेशा दो पडोसी देशों को लड़ाया है.
आतंकवाद को बढ़ावा दिया है.

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

महिला सशक्तिकरण

एक और सशक्तिकरण समारोह
तालियों की गडगडाहट के बीच लंबे -चौडे भाषण
अतीत का दुःख तथा भविष्य के सपने
वर्तमान का पता नही .......

इसके [ वर्तमान ] अतिरिक्त न जाने क्या-क्या
क्या बदला हमारे बीच ,कुछ नही .......
सब पुराने ढर्रे पर ....

हाँ ,दिवस में एक नाम और जुड़ गया
मिल गए घंटों परिचर्चा के ,बहसों के ...
चाय की चुस्कियों के ...

जिनकी समस्या वही नदारद
वो जिनकी पैदावार ही इसलिए होती है
की ........वे रसोई और बिस्तर से ज्यादा सोचें
वंश बढाये और अपने बनाये खाने की तारीफ़ सुने
और मान लें की इससे ज्यादा प्रशंसा
किसी चीज़ से नही मिल सकती
किसी भी चीज़ से नही ........

सशक्त महिलाओं की सभा समाप्त
वे लौट पड़ी .............
अगली बार फ़िर
सशक्तिकरण दिवस
सशक्त तरीके से मनाने का प्रण लेकर.

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

आतंकवाद

आतंकवाद के विरूद्ध
क्या किया हमने ?
हर हमले के बाद ...
कुछ मोमबत्तिया जलाई
चंद फूल चढाये/मृतकों की याद में
मिनट दो मिनट मौन रखा
मानव श्रंखला बनाई
सब किया
पर सबक नही लिया ...

सोमवार, 17 अगस्त 2009

बारिश

शाम का समय है.काले घनेरे बादल छाए हुए हैं.घर में इडली बनने की तैयारी है.माँ ने मुझे भी रसोई में बुला लिया.इन बादलों को देख के बड़ा सुकून मिल रहा है कि शायद आज बारिश हो जाए .माँ ने तो कह भी दिया कि पानी बरस जाए तो इडली खाने का मज़ा और बढ़ जाए .मुझे हँसी आ गई .बेचारे किसानो कि तो भगवान सुन नही रहे हमारी क्या सुनेंगे .जहा पूरे देश के अन्न का सवाल है ,वहा कोई सुनवाई नही तो क्या हमारे एक वक्त के खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए भगवान कोई दया दृष्टि दिखायेंगे .एक नज़र मैंने आसमान कि तरफ़ देखा ।मुझे बादलों की बेबसी पर तरस आ रहा था .मैंने सोचा चलो बरसात के मौसम में बारिश ना सही आंखों के सुकून के लिए देखने को बादल तो हैं.