शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

आम आदमी

दिख जाता है हर गली हर नुक्कड़ पर 
चेहरे की बेबसी छुपाये ....
आम  आदमी  
कितना निरीह 
जीवन के थपेड़े  सहता हुआ 
खुद को घसीटता
आम आदमी  ...
ता-उम्र  टूटता
जुड़ता हुआ .....
अदम्य जिजीविषा लिए
आम आदमी .

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

sapne

दरक   रहा है भीतर कुछ
बार-बार ....लगातार 
बार -बार वह खुद को तोड़ती 
जोड़ने में लगी है, सपने
दूसरों के ...
अपनी बारी के इंतजार में 
कभी तो पूरे होंगे , सपने 
जो देखे थे बचपन से ....
जीवन के गणित में  उलझी ...
बुनते हुए सपने .....
अनजान है इस बात से कि 
उसकी परिणति 
दूसरों  के सपने पूरे होते 
देख कर खुश होने में है .

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

कुछ लोग  विचार  बेचते हैं 
.लोग झंडो तले खड़े हैं विचार लिए
विविध रंगों   के झंडे 
विचार  रंगों   में बदल रहे  हैं 

 
 

शुक्रवार, 27 मई 2011

उपजाऊ जमीन के बदले विकास नही चाहिए 
 अन्नदाता के बदले करदाता नही चाहिए 
बखार के बदले  माल नही चाहिए (भट्टा पारसौल, सिंगुर,नंदीग्राम  के सन्दर्भ में )

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

शनिवार, 6 नवंबर 2010

???

ओबामा जी का स्वागत है . भारत आये हैं तो कुछ सोच कर ही आये होंगे. वर्ना उनके आगे हमारी बिसात क्या है, तभी तो भारत की सुरक्षा एजेंसियों पर उनको भरोसा नही है. अमेरिका से सब तामझाम ले कर आये हैं. हम शर्मिंदा हैं की हम उनकी सुरक्षा भी नही कर सकते . चलिए कुछ तो सबक सीखना होगा इन साहेब से.अपनी सुरक्षा अपने हाथ.हमारा कुछ काम तो कम कर दिया . खैर, जबसे आने की खबर सुनी थी यही सोच रही थी की आये क्यों हैं?? जवाब हो किसी के पास तो हमे भी बता देना...खैर.मेरी समझ काम हो सकती है पर यही लगता है परमाणु  संधि पर ही  कोई अहम्  बात होगी.कोई अपने (अमेरिका)हित की बात ही होगी..

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

चेहरा

कहते हैं  चेहरा आईना होता है
पर ...
आज-कल के आइनों से संभल  कर रहना
आईने झूठ भी बोला करते हैं.

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

चिठ्ठियाँ

( 1 )
भारत में सबसे ज्यादा डाक घर .....
क्या चिठ्ठियाँ अभी भी लिखी जाती हैं ???



( 2 )
आज भी याद है जब  बचपन में नानी हमें  चिठ्ठी लिखा करती थीं,पढ़ के  आँखों में आंसू भर जाया  करते थे और  हम  गर्मी  की छुट्टियों का इंतजार करते थे कि कब जल्दी से दिन बीते ,पढाई ख़तम हो और हम गाँव पहुँच जाएँ .

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

क्या भारत अभी भी एक कृषि प्रधान  देश है?  देश में किसानो के आत्महत्या की ख़बरें आम हैं.देश में खाद्यान्न  की आपूर्ति  के लिए  आयात  तक की नौबत  है .दाल,चीनी,प्याज आम आदमी की पहुच से बाहर है .
            गरीब इंडिया और भारत के बीच पिस रहा है.एक तरफ भूमंडलीकरण तो दूसरी तरफ सेज (विशेष आर्थिक क्षेत्र )  दोनों के बीच किसानो के  आवाज दबती जा रही है .
                                                                                        क्या केवल आर्थिक रूप से समृध्ह होना और विकसीत  देश बनने की होड़ में शामिल होना कई बड़ी समस्याओं को जन्म नही दे रहा .महंगाई का बढ़ते चले जाना मान्य हो गया है .मध्यम  वर्ग   तो फिर भी किसी तरह गुजारा  कर ले रहा है पर उन गरीबो का क्या जो दो वक़्त की रोटी   भी बड़ी मुश्किल  से जुटा पाते  हैं.

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

शांति के दूत


ओबामा को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार ...
उस देश के  राष्ट्राध्यक्ष  को
जिसने विश्व  में हर तरफ तबाही मचा रखी है.
जिसने हमेशा दो पडोसी देशों को लड़ाया है.
आतंकवाद को बढ़ावा दिया है.