गुरुवार, 19 अगस्त 2021

सोशल मीडिया -अंधी दौड़

   युवा होती पीढ़ी में इंस्टाग्राम बहुत लोकप्रिय है।  उस पर चल रही रील्स ने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हम किस दिशा में जा रहे.. हर रोज नये तरह के पहनावे और हाव-भाव के साथ उपस्थित बच्चे...और अब तो कंटेंट के नाम पर घर के बुजुर्ग भी शामिल किए जा रहे इस प्रदर्शन में। कुछ सेकेंड की वीडियो के लाखों व्यूज.. मनोरंजन के नाम पर जो हो रहा.. वह समाज को कोई दिशा नहीं देने वाला , ये तो तय है। पैसे कमा सकते हैं व्यूज के नाम पर.. लेकिन इस युवा होती पीढ़ी के पास कुछ भी शेष नहीं होगा अपनी अगली पीढ़ी को देने के लिए।

 इंस्टाग्राम पर ही एक लड़की
कहती है.. इतने सुंदर लोग आखिर इंस्टाग्राम पर आ कहाँ से रहे..? सप्लाई कहाँ से हो रही इनकी...। 
वाकई इतने खूबसूरत लड़के-लड़कियाँ की देखते रह जाओ।

                                 टिक-टॉक बैन हुआ तो लगा थोड़ी राहत हो गयी। फेसबुक पर वीडियो का ऑप्शन है.. जिस तरह के वीडियो वहाँ देखने को उपलब्ध हैं..
पॉर्न देखने के लिए कुछ तलाशने की जरुरत ही नहीं है। पहले सिर्फ पोस्ट तक सीमित फेसबुक ने सारा दिन दिल,दिमाग को बंधक बनाए रखने के लिए वीडियो का विकल्प भी डाल दिया है।
रील्स की चकाचौंध में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। रील्स बनाने वाले को फिर भी पैसे मिल रहे.. देखने वाला सारा दिन चाहे तो बैठ कर देखता रह जाये। 
             

इन सबमें ट्विटर फिर भी बेहतर है। जहाँ खबरों और सूचनाओं का आदान-प्रदान सहजता से किया जाता है। विचारों का त्वरित प्रसारण और अब तो स्पेसेस ने ट्विटर को संवाद का मुख्य जरिया बना दिया है। 

मंगलवार, 15 जून 2021

चिराग तले अँधेरा

 राजनीति में जो भी सक्रिय है, वह कभी न कभी सत्ता में आने की आशा पाले रखता है। यह आशा जब टूटती दिखती है तो हलचल पैदा करती है। बीते दिनों जो राजनीतिक उथल-पुथल हुआ , उसे सामान्य भाषा में ‘मौकापरस्ती’ बोलते हैं। एलजेपी के पाँच सांसदों ने चिराग पासवान से किनारा कर लिया। यह कैसे हुआ कि चिराग को इसकी भनक तक न लगी। यह दर्शाता है कि वे अपनी ही पार्टी में सामंजस्य स्थापित न कर सके। रामविलास पासवान के जाने के बाद एलजेपी का भविष्य संदिग्ध दिख रहा। ऐसा नहीं कि पासवान की इकलौती पार्टी इस दायरे में है। सभी क्षेत्रीय पार्टियों को अपनी प्रासंगिकता बचाये रखने के लिए महत्वपूर्ण पदों को अपने परिवार से इतर लोगों को मौका देना होगा। अन्यथा जैसे ही पार्टी सत्ता से दूर होगी या फिर पार्टी के मुखिया जीवन-विराम लेंगे, पार्टी में विद्रोह स्वाभाविक है। राजनीति का यह ‘नरेंद्र मोदी’ युग है। संभव हो या न हो पर भारतीय राजनीति में आगे का भविष्य मोदी के हाथों में ही दिख रहा। विपक्ष अधमरा हो चुका है। कांग्रेस के नेता शीर्ष नेतृत्व के भीतरमार से त्रस्त हैं। राहुल गांधी के रहते हुए युवा नेताओं का भविष्य खतरे में है। सिंधिया, जितिन प्रसाद के बाद निगाह सचिन पायलट पर टिकी है। पंजाब, राजस्थान से रह-रह कर धुँआ उठता दिख रहा , जिसे सुलझाने में कांग्रेस असक्षम है।
उधर बसपा से भी टूट की खबर आ रही है। हाल की खबरों से पता चलता है कि प्रवासी बनकर आये कुछ भाजपा विधायक टीएमसी में लौट जाने को आतुर हैं।
सत्ता से दूरी पार्टियों में बिखराव का कारण है। मौकापरस्त लोग सत्ता सम्पन्न होने को अधीर हैं।

गुरुवार, 25 मार्च 2021

धर्म / लोक

‘ इनसाइड हिंदू मॉल ‘ यह किताब अभिजीत सिंह द्वारा लिखी है। ‘ हिंदी में लिखी किताब का यह नाम क्यों ‘.. यह सवाल मन में आता है । जैसा कि किताब के शुरुआती लेखों से ही स्पष्ट है , यह युवा वर्ग को संबोधित है। आज की दौड़ती-भागती जिंदगी में ‘मॉल संस्कृति’ इतनी प्रविष्ट हो चुकी है कि लेखन इससे कैसे अछूता रह सकता है। युवाओं के मन में हिंदू धर्म को लेकर अनेक सवाल उठते रहते हैं। हिंदू धर्म के प्रति भ्रामकता बढ़ती जा रही है। युवा पीढ़ी ज्वालामुखी के उस मुहाने की ओर बढ़ रही है , जहाँ एक दिन सब भस्म हो जाना है। ऐसे समय में अभिजीत की यह किताब ‘लाइटहाउस’ बनकर युवाओं का मार्ग प्रशस्त करेगी।

‘ हिंदू होना क्या है ‘…यह मूल प्रश्न है । हिंदू धर्म के सकारात्मक  पक्ष को  लेखक ने प्रभावशाली ढंग से वर्णित किया है। इस किताब की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ये ‘समभाव’ की प्रकृति को बल देती है। भारत बहुधर्मी देश है। दूसरे के बल पर श्रेष्ठता का भाव घातक है। इस किताब में यह दर्शाया गया है कि हिंदू धर्म सबको साथ लेकर चलता है। यह बाँधता नहीं बल्कि मुक्ताकाश की अवधारणा रोपित करता है। लेखक पूर्व की कुछ घटनाओं का ज़िक्र करता है। वो बामियान की घटना हो या जैन धर्म को अल्पसंख्यक बनाये जाने की , ये संवेदनशील हिंदू को पीड़ा देने वाली बात है।  लेखक की संवेदना अपने पूर्वजों द्वारा रोपित वृक्ष की शाखाओं को कमजोर होते देख आहत है।  सम्भवतया इस किताब की प्रेरणा इन्हीं घटनाओं के बीच से मिली हो।

 

हिंदू धर्म  ‘प्रकृतिपूजक’ रहा है। वृक्ष, नदियाँ, पशु-पक्षी सभी इसके अंग हैं। भारतीय चिंतन परंपरा के द्वार सभी के लिए खुले हैं। जिसकी भी ‘लोक’ में गहरी आस्था होगी , वह हिंदू धर्म का संवाहक होगा।  अभिजीत लिखते हैं कि शिखा या जनेऊ धारण कर लेना भर धर्म नहीं है। वे उन्हीं लोक से जुड़ी बातों की चर्चा बार-बार करते हैं , जो हमें अनुवांशिक रुप में पीढियों से प्राप्त है। वे विचार हमारे रक्त प्रवाह में है। जड़ और चेतन के प्रति  जो स्नेह भाव है ,वही धर्म है। हिंदू धर्म उदारमना है। यही उसकी प्रासंगिकता का मुख्य कारण है।

 

             लेखक ने वेद की ऋचाओं से लेकर लोक में प्रचलित कथाओं को आधार बनाया है।  हमारे ऋषि-मनीषियों ने जो  लिखा है, वही मूल भावना लोक के माध्यम से व्यक्त हुई है। हिंदू धर्म का मूल ही समावेशी है। हिंदू धर्म और दर्शन शक्तिशाली विचारों का पुंज है। इस धर्म को जो भी समझने आता है , इसका होकर रह जाता है। मनुष्यता और सहनशीलता इसके मूल तत्व हैं। लेखक सचेत होकर अन्य धर्मों के प्रति तुलनात्मक नहीं होता।
लेखक का बार-बार यह आग्रह है कि यदि हिंदू धर्म में किसी तरह की विकृति आयी है तो उसमें सुधार की गुंजाइश भी है। हिंदू धर्म ने समय-समय पर खुद को परिष्कृत किया है। धर्म जीवन के सभी अंगों में समाहित है। धर्म में जब जड़ता आती है या  वह प्रतिगामी होता है तो स्वतः ही समाज से सुधार के प्रयत्न होने लगते हैं।

 

‘इनसाइड हिंदू मॉल’ उन छद्म प्रगतिशीलों को जवाब है जिन्हें हिंदू धर्म की प्रगतिशीलता नहीं दिखती। लेखक के पास लोक से जुड़ी अनेक कथायें हैं। इन कथाओं को  सबने सुन रखा होगा , पर इनसे ‘क्या ग्रहण करना है’ यह इस पुस्तक का से पता चलता है। ‘सहजता’ ही इस किताब की ‘विशिष्टता’ है।

शुरुआत के कुछ लेखों को एक ही शीर्षक के अंर्तगत रखा जा सकता था।  यह किताब  युवा पाठकों के मन-मस्तिष्क पर प्रभाव छोड़ने में सक्षम है। यह किताब ऐसे समय में आयी है जब धर्म को युवाओं के समक्ष ‘संवाद’ की तरह प्रस्तुत किये जाने की सबसे ज्यादा आवश्यकता है।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

लाल सूरज

1-

वे ..

तुम्हारी तरह फेमिनिस्ट नहीं थीं

और 

न ही उन्होंने उगा रखा था 

माथे पर लाल बिंदी का सूरज

वे तो स्वयं दीपित थीं..

अपने कर्तव्य से ..

उन्होंने उठा रखी थी ढाल 

अपने धर्म पर पड़ने वाले हर प्रहार को 

विनष्ट करते हुई..

वे  राह दिखा रहीं थीं।

आने वाले समय में जब कोई पूछे सवाल 

कि स्त्री समाज में 'चैतन्यता कहाँ थी'

तब वे प्रतिउत्तर में 

अपनी तलवार के साथ 

खड़ी दिखाई दें ..

2-

जब कोई पूछे कि

इतिहास के पन्नों में

'कहाँ है तुम्हारी शौर्य कथा'

वे ..

अपनी पूरी ऊर्जा के साथ

खड़ी दिखाई दें..

उन षड़यंत्रों के खिलाफ

जो अनवरत रची जा रही

सृष्टि के उस संयमशील धर्म को

अभिमन्यु की तरह घेर कर..

परास्त करने में...

अंकित हैं वे सब स्त्रियाँ
आकाश के पटल पर..
अंकित है उनका इतिहास
तुम्हारे काले शब्दों के अंतराल में..

(उन चेतना सम्पन्न वीरांगनाओं के लिए , जिनके ज, औदार्य की गाथा लिखने का साहस कम ही जुटा पाए इतिहासकार)

बुधवार, 12 अगस्त 2020

बिसात पर मात

यह राजनीति की बिसात पर शह और मात का खेल है। राजस्थान में ऊपर-ऊपर भले ही सब सेट नज़र आ रहा हो, अन्दर खाने में खेल खत्म नहीं हुआ। फिलहाल अशोक गहलोत भारी हैं सचिन पायलट पर। पार्टी की सुप्रीम कोर्ट ने भले ही सचिन के पक्ष में फैसला दिया हो पर कद तो अशोक गहलोत का बड़ा दिख रहा। सचिन ने बड़ी चूक कर दी। जो फैसला लिया, वे उस पर टिके नहीं रह पाए। यह सामान्य नियम है कि उचित या अनुचित जब एकबार कदम आगे बढ़ा दिया तो वापसी नहीं करनी थी। लेकिन अनुभव की कमी और पर्याप्त मैनेजमेंट न होने के कारण उन्हें वापसी को बाध्य होना पड़ा। राजनीतिक महत्वाकांक्षा होना गलत नहीं । लेकिन गलत समय पर लिया गया निर्णय व्यक्ति के भविष्य को जरुर प्रभावित करता है। इस निर्णय के भी दूरगामी परिणाम नज़र आ रहे। 

     विद्रोह की शुरुआत में सचिन मजबूत नज़र आ रहे थे। ऐसा लग रहा था कि सचिन पायलट गहरा असर छोड़ सकते हैं । लेकिन अशोक गहलोत समय रहते स्थिति संभालने में सफल हुए। 

अपने मास्टरस्ट्रोक में असफल सचिन के पास वापसी के अलावा कोई रास्ता न था। अपने 18 सहयोगियों के साथ वे उस रास्ते चल पड़े , जिसकी मंजिल खुद उन्होंने भी निश्चित नहीं की थी। राजनीति में यह इमेच्योर निर्णय उनकी खुद की छवि को डेंट लगा गया। 

 राजस्थान में जमीनी मेहनत कर सत्ता वापसी का सिरमौर सचिन ने खुद के सिर पर सजते देखा। पर अशोक गहलोत ने केंद्रीय नेतृत्व को पहले ही अपने पक्ष में आश्वस्त कर रखा था। यह राजस्थान राजनीतिक संकट की  बड़ी वजह बना। अशोक गहलोत ने सचिन पायलट पर जिस तरह व्यक्तिगत आक्षेप लगाए , उससे उनके मंशा जाहिर होती है। 'फॉरगेटएंड फॉरगिव' ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं। 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

कोविड-19 ने विश्व के शक्तिशाली और सुविधा सम्पन्न देशों को हताश और मजबूर कर दिया है।एक ओर जहाँ कोविड-19 दुनियाभर में अपना प्रकोप दिखा रहा है, वहीं भारत  सरकार ने अपनी अग्रिम तैयारी कर रखी है।  जो देश समय रहते चौकन्ने हो गए उनमें कम नुकसान की संभावना है। अंदाजा भी नहीं कि इस वायरस ने कितनी खामोशी से विश्व में पांव पसार लिए हैं। हम भौतिकता की अंधी दौड़ में भागे जा रहे थे। जीवन का बहुत कुछ पैसा कमाने की रेस में छूट रहा था। समय का इतना अभाव की खाने तक का वक़्त नहीं.. और आज लगता है प्रकृति ने ‘यू-टर्न’ ले लिया है। जैसे एक छोटे से वायरस ने जीवन का सार समझा दिया हो। निश्छल प्रकृति अपने दोहन से रुष्ट हो गयी हो.. पृथ्वी ,आकाश, वायु सब कह रहे हों कि अपनी सीमा तय करो। किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि जीवन इस तरह रुक जाएगा।
                     वैज्ञानिक प्रगति देश और समाज के लिए चाहे जितना जरूरी हो.. प्रकृति के लिए हमेशा नुकसानदायक रहा है। मानव और प्रकृति के सहसम्बन्धो को फिर से समीक्षा की आवश्यकता है।
               कोविड-19 ने एक नए विमर्श को भी जन्म दिया कि ‘धर्म छुट्टी पर है और विज्ञान ड्यूटी पर है।’ क्या वाकई ऐसा है...नहीं। यह लोकधर्म ही है जो सामुहिक चेतना के रुप में निर्बलों का सहारा बन के खड़ा है। लोग स्वतः ही गरीबों तक खाना पहुंचा रहे हैं। जो राज्य सरकारें राशन उपलब्ध कराने का दावा कर रहीं ,यह उनका दायित्व है। पर जनता का धर्म है कि वह घर रहकर वायरस के संक्रमण को रोके। विज्ञान यदि ड्यूटी पर है तो यह भी एक तरह का धर्म ही है। स्टीफन हॉकिंग ने कहा है-‘science will win because it works’ तो क्या धर्म काम नहीं कर रहा। यह वायरस इंसानों के लिए चुनौती है। निःसंदेह विज्ञान इस चुनौती को हल कर रहा। धर्म और विज्ञान में हार-जीत का मामला नहीं। दोनों ही मानव के हित और मानवता के पक्ष में खड़े हैं। डॉक्टर अपने जीवन को खतरे में डालकर भी सेवा कर रहे ये उनका धर्म है। सफाईकर्मी अपना धर्म निभा रहे। सोशल मीडिया पर घर के बाहर बैठकर खाना खाते पुलिस वालों की फोटो वायरल हो रही..क्या वो अपना धर्म नहीं निभा रहे।
संकट के क्षण में कई बार जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। कोरोना संकट के बाद जीवन पहले जैसा शायद न रह पाए। विश्व के स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात पर नज़र बनाये हैं कि भारत जैसी घनी आबादी किस तरह इस संक्रमण से खुद को बचा पाएगी। जबकि अमेरिका जैसे सुविधा सम्पन्न राष्ट्र ने इस वायरस के आगे हाथ खड़े कर दिए हैं । चिंता की बात है कि अगर कोविड-19 ने भारत में पाँव पसारे तो अपनी कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के बल पर खुद को संक्रमण से रोक पाना बहुत मुश्किल होगा। सोशल डिस्टेंसिंग भले ही लागू हो पर सामूहिकता की भावना नये सिरे से समाज में अपना स्थान बना रही है। कोरोना रोगी के ठीक होकर लौट आने के बाद उसके साथ मानवीय ढंग से पेश आना सभ्य समाज की जिम्मेदारी है। घरों में कैद लोग  आशान्वित हैं कि जल्द ही कोरोना संकट से मुक्ति की राह मिलेगी। इस आपदा के समय खुद को सकारात्मक और संवेदनशील बनाये रखने की आवश्यकता है।

बुधवार, 10 अप्रैल 2019

11 अप्रैल 19 ..प्रथम चरण के चुनाव की शुरुआत है। मोदी को लेकर जनता आश्वस्त है कि 'आयेगा तो मोदी ही'... यह आश्वस्ति एक तरह की अपेक्षा है...कुछ बेहतर होने की अपेक्षा... मोदी सरकार ने पिछले 5 सालों में ऐसा कुछ नहीं किया जो जनता को प्रत्यक्ष लाभ के रूप में दिखाई दे। पर ऐसा भी नहीं है कि योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं दिख रहा हो। सड़कें हों या रेलवे स्टेशन... काम दिख रहा है। 72000 के बजाय लोग मोदी के काम पर ज्यादा भरोसा जता रहे। 'मोदी है तो मुमकिन है'...इस तरह के गढ़े गए नारे.. उस भरोसे को और मजबूत करते हैं। इमरान खान ने मोदी के जीतने वाली बात कहकर मोदी को नुकसान पहुँचाने का काम किया है। देश को अस्थिर सरकार नहीं चाहिए। देश को अपने हित साधने वाली सरकार नहीं चाहिए। देश को गठबन्धन की सरकार नहीं चाहिए। .....जनता ने पिछली बार एक मजबूत सरकार को चुना और उसका प्रभाव भी देखा...इस बार भी वोट जनता उचित का निर्णय कर ही करेगी।
                              उम्मीद है भारत का भविष्य उज्जवल होगा। उम्मीद है...जनता सही फैसला करेगी।

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

पडोसी को जवाब

उरी पर हुए हमले ने सभी को   झकझोर दिया था. जनता सरकार की ओर से जवाबी कार्यवाही की प्रतीक्षा में थी. यू एन में सुषमा स्वराज के भाषण ने पाकिस्तान को संतुलित शब्दों में जवाब दिया,पर उरी हमलों के जख्मों की भरपाई नही हो पायी थी. पाकिस्तान की सीमा  में घुसकर सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया. पाकिस्तान जैसे आतंकवाद को पोषित करने वाले देश के लिए यह अप्रत्याशित था. सेना ने सीमा पार के कई आतंकी ठिकानो को नष्ट कर दिया. 35 -40 के करीब आतंकियों को मार गिराया। पाकिस्तान विश्व मंच पर यह स्वीकार भी नहीं कर पा रहा कि भारतीय सेना ने उसकी सीमा में 2 किलोमीटर तक घुसकर उसके पाले हुए दहशतगर्दों को मार गिराया है. सुषमा स्वराज के सधे हुए शब्दों ने पाकिस्तान को यू एन के मंच से आईना दिखाया था. सुषमा जी ने बड़ा जायज सवाल उठाया था कि आतंकियों के न खुद के बैंक हैं ,न खुद की हथियार फैक्ट्री. फिर आखिर कौन वो लोग हैं जो आतंकियों को धन और हथियार मुहैया कराते हैं. 
                            भारत सरकार हर संभव कोशिश करती दिखी कि  पाकिस्तान के साथ उलझे रिश्तों को सुलझा लिया जाये.लेकिन पठानकोट तथा उरी  जैसे हमलों ने पाकिस्तान की मंशा को स्पष्ट कर दिया. जबकि समय-समय पर पाकिस्तान खुद भी ऐसे आतंकी हमलों का शिकार होता रहा है,वह दहशतगर्दों को प्रश्रय देना नहीं छोड़ रहा. बाचा खान यूनिवर्सटी ,पेशावर अटैक जैसे आतंकी हमलों ने भी पाकिस्तान की आँख नहीं खोली। वह बड़े-बड़े आतंकी संगठनो को प्रश्रय देना जारी रखे है. कूटनीतिक स्तर  पर भी भारत ने सार्क सम्मेलन में न जाकर बड़ी सफलता हासिल की है. अफगानिस्तान ,भूटान और बांग्लादेश ने भारत की पक्षधरता करते हुए सार्क सम्मेलन  में जाने से इंकार कर दिया ,जिस कारण पाकिस्तान में होने वाले इस सम्मेलन को रद्द करना पड़ा. 
                                                 पाकिस्तान चौतरफा हमले से बौखला गया है. अभी भारत सरकार द्वारा दिया गया 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' का दर्जा भी छीने जाने की ओर है. सरकार ने दबाव बनाने में कोई कसर  नहीं छोड़ी है. आतंकवाद समर्थक राष्ट्र को बहिष्कृत किया जाना और विश्व स्तर पर आर्थिक संबंधों को कमजोर करना ,ये दोनों महत्वपूर्ण कदम विश्व स्तर पर उठाये जाने की आवश्यकता है.  

पडोसी को जवाब

उरी पर हुए हमले ने सभी को   झकझोर दिया था. जनता सरकार की ओर से जवाबी कार्यवाही की प्रतीक्षा में थी. यू एन में सुषमा स्वराज के भाषण ने पाकिस्तान को संतुलित शब्दों में जवाब दिया,पर उरी हमलों के जख्मों की भरपाई नही हो पायी थी. पाकिस्तान की सीमा  में घुसकर सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया. पाकिस्तान जैसे आतंकवाद को पोषित करने वाले देश के लिए यह अप्रत्याशित था. सेना ने सीमा पार के कई आतंकी ठिकानो को नष्ट कर दिया. 35 -40 के करीब आतंकियों को मार गिराया। पाकिस्तान विश्व मंच पर यह स्वीकार भी नहीं कर पा रहा कि भारतीय सेना ने उसकी सीमा में 2 किलोमीटर तक घुसकर उसके पाले हुए दहशतगर्दों को मार गिराया है. सुषमा स्वराज के सधे हुए शब्दों ने पाकिस्तान को यू एन के मंच से आईना दिखाया था. सुषमा जी ने बड़ा जायज सवाल उठाया था कि आतंकियों के न खुद के बैंक हैं ,न खुद की हथियार फैक्ट्री. फिर आखिर कौन वो लोग हैं जो आतंकियों को धन और हथियार मुहैया कराते हैं. 
                            भारत सरकार हर संभव कोशिश करती दिखी कि  पाकिस्तान के साथ उलझे रिश्तों को सुलझा लिया जाये.लेकिन पठानकोट तथा उरी  जैसे हमलों ने पाकिस्तान की मंशा को स्पष्ट कर दिया. जबकि समय-समय पर पाकिस्तान खुद भी ऐसे आतंकी हमलों का शिकार होता रहा है,वह दहशतगर्दों को प्रश्रय देना नहीं छोड़ रहा. बाचा खान यूनिवर्सटी ,पेशावर अटैक जैसे आतंकी हमलों ने भी पाकिस्तान की आँख नहीं खोली। वह बड़े-बड़े आतंकी संगठनो को प्रश्रय देना जारी रखे है. कूटनीतिक स्तर  पर भी भारत ने सार्क सम्मेलन में न जाकर बड़ी सफलता हासिल की है. अफगानिस्तान ,भूटान और बांग्लादेश ने भारत की पक्षधरता करते हुए सार्क सम्मेलन  में जाने से इंकार कर दिया ,जिस कारण पाकिस्तान में होने वाले इस सम्मेलन को रद्द करना पड़ा. 
                                                 पाकिस्तान चौतरफा हमले से बौखला गया है. अभी भारत सरकार द्वारा दिया गया 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' का दर्जा भी छीने जाने की ओर है. सरकार ने दबाव बनाने में कोई कसर  नहीं छोड़ी है. आतंकवाद समर्थक राष्ट्र को बहिष्कृत किया जाना और विश्व स्तर पर आर्थिक संबंधों को कमजोर करना ,ये दोनों महत्वपूर्ण कदम विश्व स्तर पर उठाये जाने की आवश्यकता है.  

बुधवार, 14 सितंबर 2016

14 सितम्बर

आज हिंदी दिवस है। कभी सोचा है, भारत जैसे 125 करोड़ की आबादी वाले देश में उसे अपनी भाषा का दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। आज हम उस दौर में हैं जहाँ हिंदी की अनगिनत पत्रिकाएं हैं, कई हिंदी न्यूज़ चैनल हैं और तो और फेसबुक है।
                            फेसबुक ने हिंदी लिखने -पढ़ने वालों को खूब मौका दिया है। न केवल हिंदी भाषा का विस्तार हो रहा फेसबुक के माध्यम से बल्कि देवनागरी लिपि को भी एक मंच मिला है। देवनागरी लिखने-पढ़ने में सरल तो है ही ,फेसबुक की इन्टरनेट की दुनिया में आँखों के लिए सहज ग्राह्य भी है।